डायरी का डर
एक नेता जी
चन्दा डकार गये एक कार्यकर्ता को हडका रहे थे/
उसे चरित्र व सिध्दान्त का अर्थ समझा रहे थे/
कह रहे थे - तुमने चन्दा खाकर
मेरे एकाधिकार और अपने चरित्र को
फाँसी पर लटका दिया हैं/
अर्थात - मेरे देश खाने की योजना को
जोरदार झटका दिया हैं/
तेरे इस अपराध का क्या किया जायें/
तुझे मार दिया जाए या छोड़ दिया जायें/
जबाब में कार्यकर्ता ने झोले से एक डायरी निकाली
हथेली पर तौली हवा में उछाली /
फिर कैच करतें हुएं बोला ---
आपके जबाब में मैं भला क्या बोलुँ
इजाजत हो तो डायरी खोलूँ
डायरी का नाम सुनते ही नेता घबरा गया
उसका गुस्सा कुत्तूबमीनार से उतर कर मेन होल में आ गया
बोला - नालायक, चालबाज, गुन्डा, शातिरचोर,
खलनायक, बन्ड॒लबाज, नमकहराम,चन्दाचोर
तुझे इसमे जो जी आये बोल
पर भगवान के लिए डायरी मत खोल
क्योकि एक डायरी खुलनें सें
भले भलो की कलई खुल गयी हैं/
देश की मजबुत कुर्सी हिल गई हैं/
और प्रजातन्त्र की इज्जत मिट्टी में मिल गई हैं!!!
ROHIT KUMAR
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